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व्यवसाय चौपट, किसानी हलकान, युवा मन आहत….

मधुबनी | 

झंझारपुर के इतिहास ने उथल पुथल की राजनीतिक दास्तानों को अपने आगोश में समेट रखा है। समाजवादियों का परचम थामने वाले इस लोकसभा क्षेत्र ने दक्षिणपंथ की करवट भी ली। शुरूआती दौर में कांग्रेस ने भी अपनी जड़े यहां

पुख्ता कर रखी थी। लब्बोलुआब यह कि यहां के जनमानस का मिजाज मौसम के थपेड़ों की तरह बदलता रहा है। मौजूदा लोकसभा आम चुनाव अब जबकि सन्निकट है, यहां की राजनीतिक सरगर्मी वोटरों के सिरचढ़ बोल रही और प्रत्याशी उसे समझ अपने पक्ष में मोड़ने को आमादा हो चले हैं। वर्तमान राजनीतिक हवा के तापमान का आकलन करती झंझारपुर से शैलेन्द्र नाथ झा की रपट। राजनीति की बिसात और जनसमस्याओं की मोहरें : मौसम करवट ले रहा है। जाड़े का चोगा उतार गर्मी के पहनावे में लोगबाग दिखने लगे है। साथ ही इस आबोहवा में चुनावी सरगर्मी भी घुल चुकी है। झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र अपनी राजनीतिक थाती को संभाले तत्काल उस चौराहे पर खड़ा दिखता है जहां से वह आगामी 23 अप्रैल को किस राह चलेगा और फिर 23 मई को अपनी किस मंजिल पर पहुंचेगा इसका हर कोई अपनी-अपनी समझ से आकलन करने में मशगूल दिखते हैं। अब झंझारपुर रेलवे स्टेशन बाजार को ही लीजिए दशकों से यह इलाका सघन व्यवसायिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। लखनौर प्रखंड की बेहट दक्षिणी पंचायत अंतर्गत आने वाले इस इलाके में जिधर नजर फेरिए जलभराव की भयावह स्थिति ही दृष्टिगोचर होती है। मिथिला की पहचान पान की गिलौरी मुंह में दबाए 73 वर्षीय रामलोचन पंडित बड़ी तल्खी से कहते हैं, लक्ष्मी के आवक बला स्थान में सेहो एहन गंदगी पसरल अछि तं एतुका

समृद्धि केर अपेक्षा कोना राखल जा सकैछ? ‘ यहां व्यवसायी और ग्राहक दोनों परेशान और क्षुब्ध दिखते हैं। कहने को तो लोकसभा क्षेत्र में सड़कों का जाल बिछा दिया गया है, लेकिन यहां की जर्जर हालत उस विकास का मुंह चिढ़ाती ही नजर आती है। हां, इतना जरूर है कि जनता अब बैकफुट से फ्रंटफुट पर आ चुकी है। लोग कहते

हैं कि मतदान करबै त जरूर मुदा बिना ठोक बजैने नहि’। प्रमंडलीय मुख्यालय दरभंगा से 40 किमी पूरब बसा है झंझारपुर अनुमंडल मुख्यालय। ईस्ट-बेस्ट कोरिडोर अंतर्गत राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या-57 से झंझारपुर रेलवे स्टेशन बाजार आने के लिए दो रास्ते हैं। लेकिन, दोनों ही रास्ते आवागमन लायक नहीं। वाया विदेश्वर स्थान, कमला-बलान रेल सह सड़क पुल होकर ही अनुमंडल मुख्यालय पहुंचना तनिक सुगम लगता है। जबकि इस पुल को पार करते वक्त भी जान हथेली पर ही होती है। अवाम गांव के बैद्यनाथ झा कहते हैं कि इस होकर भी झंझारपुर पहुंचने में सांस अटकी ही रहती है। नवटोल अंडरपास से लेकर स्टेट बैंक रोड में भी वही दुरुह स्थिति। जिधर देखिए गंदे पानी का ही दृश्य। सभी जमात के लोग यहां व्यापार करते हैं। अपने व्यवसायिक प्रतिष्ठान के चारो ओर विकट राह से घिरे ये व्यवसायी दिनभर ग्राहकों की टकटकी लगाए मिलते हैं। बताते हैं ग्राहक वही आते हैं जिन्हें बैंक का काम होता है। वहां भी पेंशन लेने के लिए आए वरिष्ठ नागरिक टेंशन में ही दिखते हैं। पास से गुजरते बीए में पढ़ने वाले राजकुमार साह ठिठके और सिर झटकते कहा अधिकारियों, नेताओं से भी कई बार गुहार लगाई है, लेकिन सब टांय-टांय फिस्स!’ सिस्टम के प्रति आक्रोश स्पष्ट है। उहापोह में नहीं रहना चाहती जनता : बेहट दक्षिणी पंचायत में किसान भी हलकान है। न नहर, न नलकूप। नीलगाय व जंगली सूअर का उपद्रव सो अलग। किशोरवय अवधेश आजाद साथियों संग मायूस थे। इन्हें खेल का मैदान मयस्सर नहीं। रेलवे स्टेशन बाजार में रात में जरूरी स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की ओर भी अबतक किसी का ध्यान नहीं गया। कैथिनियां गांव निवासी व्यवसायी अशोक कुमार झा की टिप्पणी गौरतलब है। कहा कि बहुत चुन लिए एलएलए-एमपी। अब चुनना है नेता को जो केवल जनता की सोचें।’ बगल में खड़े राहुल टिबरेवाल भी हामी फरते दिखे। राम विलास साह, प्रो. विशेषानंद मिश्र, हरेन्द्र कुमार झा, मनोज कुमार राय, अजय टिबरेवाल को मलाल है कि जलजमाव के कारण टिबरेवाल उच्च विद्यालय बूथ तक शायद वे पहुंच भी नहीं पाएं। व्यवसायी प्रेम केजरीवाल, प्रकाश केजरीवाल भी अनुमंडल मुख्यालय के लिए समुचित व्यवस्था का विश्वस्त आश्वासन देने वाले उम्मीदवार की तलाश में हैं। नवागंतुकों पर इस बार नजर : पिछली दफा के भाजपा सांसद विरेन्द्र कुमार चौधरी इस बार परिदृश्य में नहीं हैं। निकटतम प्रतिद्वंद्वी रहे राजद के मंगनीलाल मंडल भी सीन से बाहर। टिकट नहीं मिलने से खफा होकर इन्होंने राजद से नाता भी तोड़ लिया है। जदयू का दामन थाम पिछली बार चुनाव में उतरे देवेन्द्र प्रसाद यादव इस बार सजद-डी के झंडा तले हैं। जदयू से रामप्रीत मंडल तो राजद से गुलाब यादव नए खिलाड़ियों के रूप में जोर आजमाइश कर रहे हैं। समय के साथ नासूर बनती जा रही समस्या : जलजमाव तीन साल से यहां नासूर बना हुआ है। हालांकि बीते दो वर्षों में

अनुमंडल प्रशासन ने संजीदगी दिखाई और जलनिकासी कराई। लेकिन, इस बार जलभराव ने नए इलाके को भी अपनी चपेट में ले लिया है। रेलवे की मिलकियत वाले इलाके की इस समस्या के प्रति रेलवे को कोई रूचि नहीं। आमान परिवर्तन के कारण बदली भौगोलिक परिस्थिति तथा भू-स्वामियों द्वारा अपनी जमीन भरे जाने के कारण यह स्थिति बनी है। स्थानीय व्यवसायी तो ऐसी स्थिति में पलायन को विवश दिखते हैं ||

NBL Madhubani

"है जो जमीर जालिम उसे बेनकाब कर दे,ये खामोशी तोड़ दे तू इंकलाब कर दे"

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